स्तुति संग्रह
ॐ नमः शिवाय:
हे आशुतोष महाकालेश्वर विश्वनाथ महेश्वरा, देवाधिदेव महादेव, नमामी नागेश्वरा।
हे अमरनाथ, हरिहरेश्वर, पशुपति केदारेश्वरा, सिंद्धनाथम्, वैद्यनाथम्, नमामी रामेश्वरा।
हे नीलकंठम् उमानाथम्, त्रिपुरारी-सोमेश्वरा, शक्ति-शिवम् मल्लिकार्जुन नमामी सिंघेश्वरा।
हे महायोगी, गरीबनाथम्, त्रिनेत्रम् घुश्मेश्वरा, कोटि-कोटि नमामी शम्भू, नमामी दिगम्बरा।
हे ॐकारेश्वर,त्रयम्बकेश्वर, चन्दमौली भीमशंकरा, कोटि-कोटि नमामी भोले, नमामी बाघम्बरा ।
नमामी पंचाक्षरा
गौरीश्वरस्तुतिः
दिव्यं वारि कथं यतः सुरधुनी मौलौ कथं पावको दिव्यं तद्धि विलोचनं कथमहिर्दिव्यं स चाङ्गे तव।
तस्माद् द्यूतविधौ त्वयाऽद्य मुषितो हारः परित्यज्यता मित्थं शैलभुवा विहस्य लपितः शम्भुः शिवायास्तु वः ॥ १॥
श्रीकण्ठस्य सकृत्तिकार्द्रभरणी मूर्तिः सदा रोहिणी ज्येष्ठा भाद्रपदा पुनर्वसुयुता चित्रा विशाखान्विता ।
दिश्यादक्षतहस्तमूलघटिताषाढा मघालङ्कृता श्रेयो वै श्रवणान्विता भगवतो नक्षत्रपालीव वः ॥ २ ॥
एषा ते हर का सुगात्रि कतमा मूर्छिन स्थिता किं जटा हंसः किं भजते जटां नहि शशी चन्द्रो जलं सेवते ।
मुग्धे भूतिरियं कुतोऽत्र सलिलं भूतिस्तरङ्गायते एवं यो विनिगूहते त्रिपथगां पायात् स वः शङ्करः ॥ ३॥ ॥
इति गौरीश्वरस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
शिव स्तुति
दोहा
श्री गिरिजापति वंदिकर, चरण मध्य शिरनाय । कहत अयोध्यादास तुम, मोपर होहु सहाय ।।
कवित्त
नन्दी की सवारी नाग अंगीकार धारी नित, संत सुखकारी नीलकंठ त्रिपुरारी हैं ।
गले मुण्डमाला धारी, सिर सोहे जटाधारी वाम अंग में बिहारी, गिरिजा सुतवारी हैं ।।
दानी देख भारी, शेष शारदा पुकारी । काशीपति मदनारी, कर त्रिशूल चक्रधारी हैं ।।
कला उजियारी, लख देव सो निहारी । यश गावें वेदचारी, सो हमारी रखवारी है ।।
शम्भु बेठे हैं विशाला, भंग पीवें सो निराला । नित रहे मतवाला, अहि अंग पै चढ़ाये हैं ।।
गले सोहे मुंडमाला, कर डमरू विशाला । अरु ओढ़े मृगछाला, भस्म अंग में लगाये हैं ।।
संग सुरभि सुतशाला, करें भक्त प्रतिपाला । मृत्यु हरें अकाला, शीश जाता को बढ़ाये हैं ।।
कहैं रामलाला, करो मोहि तुम निहाला अब । गिरिजापति कसाला, जैसे काम को जलाये हैं ।।
मारा है जलंधर और त्रिपुर को संहारा जिन । जारा है काम जाके शीश गंगधारा है ।।
धारा है अपार जासु , महिमा है तीनों लोक । भाल सौहे इन्दु , जाके सुषमा की सारा है ।।
सारा अहिबात सब , खायो हलाहल जानि । भक्तन के अधारा जाहि वेदन उचारा है ।।
चारों हैं भाग जाके द्वार हैं गिरीश कन्या । कहत अयोध्या सोई मालिक हमारा है ।।
अष्ट गुरु ज्ञानी , जाके मुख वेदबानी । सोहै भवन में भवानी सुख संपत्ति लहा करें ।।
मुण्डन की माला जाके चंद्रमा ललाट सोहे । दासन के दास जाके दारिद दहा करें ।।
चारों द्वार बन्दी, जेक द्वारपाल नंदी । कहत कवी आनन्दी, नर नाहक हा हा करें।।
जगत रिसाय, यमराज की कहा बसाय । शंकर सहाय, तो भयंकर कहा करें ।।
सवैया
गौर शरीर में गौर विराजत। मौर जटा सिर सोहत जाके ।।
नागन को उपवीत लसै । अयोध्या कहे शशि भल में ताके ।।
दान करै पल में फल चारि । और टारत अंक लिखे विधनाके ।।
शंकर नाम नि: शंक सदा ही । भरोसे रहैं निशिवासर ताके ।।
दोहा
मंगसर मास हेमंत ऋतु , छ्ठ दिन है शुभ बुद्ध । कहत अयोध्या दस तुम, शिव के विनय समुद्ध ।।
नटराज स्तुति
सत सृष्टि तांडव रचयिता नटराज राज नमो नमः...
हेआद्य गुरु शंकर पिता नटराज राज नमो नमः...
गंभीर नाद मृदंगना धबके उरे ब्रह्माडना
नित होत नाद प्रचंडना नटराज राज नमो नमः...
शिर ज्ञान गंगा चंद्रमा चिद्ब्रह्म ज्योति ललाट मां
विषनाग माला कंठ मां नटराज राज नमो नमः...
तवशक्ति वामांगे स्थिता हे चंद्रिका अपराजिता
चहु वेद गाए संहिता नटराज राज नमोः...
सत सृष्टि तांडव रचयिता नटराज राज नमो नमः...
बाबा तेरे चरणों की
बाबा तेरे चरणों की गर धूल जो मिल जाए सच कहता हूँ मेरी तकदीर बदल जाए ।
सुनता हूँ दया तेरी दिन रात बरसती है, एक बूँद जो मिल जाए मन की कली खिल जाए ।
बाबा तेरे ...
ये मन बड़ा चंचल है कैसे तेरा भजन करूँ जितना इसे समझाऊँ, उतना ही मचल जाए ।
बाबा तेरे ...
भोले मेरे जीवन में बस एक ही तमन्ना है तुम सामने हो मेरे ये प्राण निकल जाए ।
बाबा तेरे ...
नजरों से गिराना ना चाहे जितनी सजा देना नजरों से गिर जाए, मुश्किल है संभल पाना
बाबा तेरे ...
भोले मेरे जीवन में बस एक सहारा है, करूणा कर दो मुझ पे भव बंधन मिट जाए ।
बाबा तेरे ...
शिव मानस पूजा
रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्।
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्॥1॥
सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम्।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु॥2॥
छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो॥3॥
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥4॥
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा। श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व। जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो॥5॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता ॥