आरती संग्रह
जगमग जोत जले मंदिर में
जगमग जोत जले मंदिर में बाबा-नागेश्वर दरबार। नागेश्वर दरबार हो बाबा नागेश्वर दरबार, जगमग जोत....
कार्तिक गणपति संग बिराजै, मैया करे दुलार। जगमग जोत....
कार्तिक गणपति संग बिराजै, बसहा बैल सवार। जगमग जोत....
ऐसे दीन दयालु मेरे बाबा, पल में भरे भंडार। जगमग जोत....
जो कोई शरण तिहारो आवे, कर दो बेड़ा पार।जगमग जोत....
कंचन थाल कपूर के बाती, जगमग जोत जले सारी राती ॥ बाबा के दरबार
जगमग जोत जले मंदिर में बाबा-नागेश्वर दरबार। नागेश्वर दरबार हो बाबा नागेश्वर दरबार, जगमग जोत....
शीश गंग अर्धंग
शीश गंग अर्धंग पार्वती, सदा विराजत कैलासी । नंदी भृंगी नृत्य करत हैं, धरत ध्यान सुर सुखरासी ॥
शीतल मन्द सुगन्ध पवन, बह बैठे हैं शिव अविनाशी । करत गान-गन्धर्व सप्त स्वर, राग रागिनी मधुरासी ॥
यक्ष-रक्ष-भैरव जहँ डोलत, बोलत हैं वनके वासी ।कोयल शब्द सुनावत सुन्दर, भ्रमर करत हैं गुंजा-सी ॥
कल्पद्रुम अरु पारिजात तरु, लाग रहे हैं लक्षासी । कामधेनु कोटिन जहँ डोलत, करत दुग्ध की वर्षा-सी ॥
सूर्यकान्त सम पर्वत शोभित, चन्द्रकान्त सम हिमराशी । नित्य छहों ऋतु रहत सुशोभित, सेवत सदा प्रकृति दासी ॥
ऋषि मुनि देव दनुज नित सेवत, गान करत श्रुति गुणराशी । ब्रह्मा, विष्णु निहारत निसिदिन, कछु शिव हमकूँ फरमासी ॥
ऋद्धि-सिद्धि के दाता शंकर, नित सत् चित् आनन्दराशी । जिनके सुमिरत ही कट जाती, कठिन काल यमकी फांसी ॥
त्रिशूलधरजी का नाम निरन्तर, प्रेम सहित जो नर गासी । दूर होय विपदा उस नर की, जन्म-जन्म शिवपद पासी ॥
कैलासी काशी के वासी, विनाशी मेरी सुध लीजो । सेवक जान सदा चरनन को, अपनो जान कृपा कीजो ॥
तुम तो प्रभुजी सदा दयामय, अवगुण मेरे सब ढकियो । सब अपराध क्षमाकर शंकर, किंकर की विनती सुनियो ॥
शीश गंग अर्धंग पार्वती, सदा विराजत कैलासी । नंदी भृंगी नृत्य करत हैं, धरत ध्यान सुर सुखरासी ॥
जय पार्वती माता
जय पार्वती माता जय पार्वती माता। ब्रह्म सनातन देवीशुभ फल की दाता॥ जय पार्वती माता
अरिकुल पद्म विनाशिनिजय सेवक त्राता। जग जीवन जगदम्बा,हरिहर गुण गाता॥ जय पार्वती माता
सिंह को वाहन साजे,कुण्डल हैं साथा। देव वधू जस गावत,नृत्य करत ताथा॥ जय पार्वती माता
सतयुग रूपशील अतिसुन्दर,नाम सती कहलाता। हेमांचल घर जन्मी,सखियन संग राता॥ जय पार्वती माता
शुम्भ निशुम्भ विदारे,हेमांचल स्थाता। सहस्र भुजा तनु धरि के,चक्र लियो हाथा॥ जय पार्वती माता
सृष्टि रूप तुही हैजननी शिवसंग रंगराता। नन्दी भृंगी बीन लहीसारा जग मदमाता॥ जय पार्वती माता
देवन अरज करत हम चित को लाता। गावत दे दे ताली,मन में रंगराता॥ जय पार्वती माता
श्री प्रताप आरती मैया की,जो कोई गाता। सदासुखी नित रहतासुख सम्पत्ति पाता॥ जय पार्वती माता
ॐ जय शिव ओंकारा
ॐ जय शिव ओंकारा, हर जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। तीनो रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला रुण्डमाला धारी। चन्दन मृग मद चंदा भाले शुभकारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधर्ता । सुखकर्ता दुखहर्ता जग पालनकर्ता ॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर दोउ मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
देवघर में बैद्यनाथ बिराजे बैजू ब्रहमचारी । नित उठ भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विश्वनाथ विराजे नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत सेवत नर नारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोइ नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा, मन भज शिव ओंकारा, मन रट शिव ओंकारा, शिव गले रुन्डल माला, शिव पीते भंग प्याला
शिव रहते मतवाला, शिव पार्वती प्यारा, शिव उपर जलधारा, शिव बैल चढ़न वाला, शिव ओढत मृगछाला
शिव भूरी जटा वाला, जटा में गंग बहत है, ललाट में चन्द्र विराजत, आसन मृगछाला.. ॐ हर हर हर महादेव
भगवान गङ्गाधर आरती
ॐ जय गङ्गाधर जय हर जय गिरिजाधीशा। त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥ ॐ हर हर हर महादेव॥
कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रुमविपिने। गुन्जति मधुकरपुन्जे कुन्जवने गहने॥
कोकिलकूजित खेलत हन्सावन ललिता। रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता॥ ॐ हर हर हर महादेव॥
तस्मिन्ल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता। तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥
क्रीडा रचयति भुषारज्जित निजमीशम्। इन्द्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्॥ ॐ हर हर हर महादेव॥
बिबुधबधू बहु नृत्यत हृदये मुदसहिता। किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वरसहिता॥
धिनकत थै थै धिनकत मृदङ्ग वादयते। क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते॥ ॐ हर हर हर महादेव॥
रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता। चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥
तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते। अङ्गुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते॥ ॐ हर हर हर महादेव॥
कर्पूरघुतिगौरं पन्चाननसहितम्। त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्॥
सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्। डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम्॥ ॐ हर हर हर महादेव॥
मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्। वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्॥
सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्। इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणम्॥ ॐ हर हर हर महादेव॥
शङ्खनिनदम् कृत्वा झल्लरि नादयते। नीराजयते ब्रह्मा वेद-ऋचां पठते॥
अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा। अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥ ॐ हर हर हर महादेव॥
ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा। रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥
सन्गतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते। शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते॥ ॐ हर हर हर महादेव॥